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Hymn No. 2990 | Date: 21-Jul-2005
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सूरज हो या तारे, या फिर दूनिया का कोई ओर सितारा,
सूरज हो या तारे, या फिर दूनिया का कोई ओर सितारा,
ढल जाते है समय गुजरते, पर समय तो बस तेरा कहा है करता।
पर्वतों को रेत में बदलते देखा, सागर को रेत मैं दम तोड़ते जाना,
तेरे इशारों पे न जाने कितनी कितनी दुनिया को बनते बिगड़ते देखा।
फिर भी तू रहता है ऐसे जैसे न जानता कुछ न कुछ समझता है।
हम भी जानने को जाने सब, फिर तुझे समझाने का प्रयास है करते।
गफलत से भरे कर्मों को करके, कहते है तेरा कहां ही तो करते है।
चाहा नहीं तेरा चाहा हुआ, करता रहा मनमाना मनमाने कर्मों का।
उससे भी ज्यादा तंग तब करता हूँ, जब सही ठूकराता हूँ खुदको।
तेरा प्रेम कहूँ या रहमत अब जानते समझाते गले लगाता।


- डॉ.संतोष सिंह