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Hymn No. 2991 | Date: 29-Jul-2005
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रह रहके रह जाता हूँ, न जाने कैसे इतनी बातें बनाता हूँ।
रह रहके रह जाता हूँ, न जाने कैसे इतनी बातें बनाता हूँ।
अगर कोई कुछ कहे तो उसे ही कुछ नया नया बताता हूँ।
कभी ना सुनी किसीकी, सुनके की अनसुनी, आज खुद को अनसुना करता हूँ।
न जाने कितनी कितनी योजनाये बनाऊँ, धरी की धरी रह जाये जो न कुछ कर दूं।
खुद से करता हूँ सवाल अब, कहाँ से पाऊँ जवाब अब जो न मानूँ कहा तेरा।
तसल्ली न है दिल को न ही मन को, पास आना चाहके जो आ ना पाऊँ पास।
अंत कैसे होगा तड़पते मन का, बाज आया फिर भी न तुझको पाया।
रह रहके भूलता हूँ सब भूला न तुझे, जो तू याद आये रह रहके मुझे।
खत्म हो तो हुयी कहानी हूँ, न कोई मेरे पास तेरी यादों के सिवाय कोई निशानी है।
फिर भी तेरे अंजाम को पाने को देखूँ, तुझमें खो जाना चाहूँ।


- डॉ.संतोष सिंह