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Hymn No. 2997 | Date: 07-Aug-2005
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रह रहके जागता हूँ, जाग जाने के वास्ते,
रह रहके जागता हूँ, जाग जाने के वास्ते,
रह रहके पुकारता हूँ, तुझे अपनाने के वास्ते।
विफलताओं की कोई बात नहीं, प्रयासों मैं है कमी,
बस अब, जो कहता हूँ उसे करना चाहता हूँ तेरे वास्ते।
दिल की पुकार है, निरंतरता की जो मांग है।
ऐसी चोट चाहता हूँ, जो तेरा बना दे मुझे।
टिका हुआ हूँ, तेरी दया पे, कृपा की मांग है,
अनचाहे हालातो में भी, कायम रहूँ मैं तुझपे।
देना नहीं चाहता हूँ, न ही विवशता की बात करूँ,
अगाध हो प्रेम तुझसे, तो अखंड विश्वास का दीप जले।


- डॉ.संतोष सिंह