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Hymn No. 296 | Date: 22-Aug-1998
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मेरे आनंद के दाता, तू ही तो है सब कुछ का ज्ञाता।
मेरे आनंद के दाता, तू ही तो है सब कुछ का ज्ञाता।
हमको तो तू ही है भाता, दूसरा कूछ ना सुहाता ।
तेरे बिना मैं अपने आपको कहीं नहीं पाता ।
वैसे भी हमको तेरे नाम के सिवाय कुछ नहीं आता जाता ।
जन्म से थें हम अँधे, ज्ञान के सूरज को कैसे पहचानते ।
दास बनके रहते थे अज्ञान के संग ।
मन में विकार के सिवाय कुछ ना होता था ।
जहाँ देखो वहाँ फैला रहता तम का अँधेरा ।
तेरा प्यार न जाने कैसे मिल गया हमें ।
जीवन भी कूछ – कूछ बदल सा गया ।
तेरे ज्ञान की किरण जैसे – जैसे प्रगट होने लगी हमारे मन में;
तम का अँधेरा छँटता चला गया ।
मन जो सारे संसार में रहता था भटकता,
सब यहाँ वहॉं होके तुझपे है टिक जाता ।
रूलाना तूझे है अभी और हमें, है कितना बाकी
बचा – खुचा भी रोके खतम् कर देना चाहता हूँ ।
यूँ ही टकटकी बाँधके तूझे देखने को है जी करता;
पल – पल गुजरता चला जाता हैं पर मन ना है भरता ।
हर पल तेरे नाम का अमृत पीता रहूँगा, चाहे तडपना पड़े मुझे सारी जिंदगी ।
- डॉ.संतोष सिंह
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