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Hymn No. 3004 | Date: 29-Aug-2005
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क्या देखूं प्रभु किसीको, जो तू न दिखे,
क्या देखूं प्रभु किसीको, जो तू न दिखे,
क्यौं न देखूं प्रभु किसीको, जो तू दिखे।
मन मैं है जो भेद, तो नजरों का क्या कसूर,
तुम्ही बताओ दोष है किसका, जो निर्दोष हो दिल।
वो तो एकटक यों ही देखे, कब कौन सा चेहरा आये,
गुम रहता हूँ तेरे विचारों में, बुनते हुये नये नये ख्वाबों को।
कभी सन्न सा रह जाता हूँ, जब कुछ नहीं पाता हूँ।
कैसे क्या कब हो जाये कुछ नहीं समझ पाता हूँ।
समय को उड़ते हूये देखता हूँ, एक सर्द सी आह निकली है,
तब कही अंतर मैं तेरी छवि कौंधती है, एक अब दूर ना होना है तुझसे।


- डॉ.संतोष सिंह