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Hymn No. 3005 | Date: 21-Oct-2005
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टूटे हुये शब्द है, भग्न हृद्य है, सुबह हो या शाम पुकारूँ जो तुझे।
टूटे हुये शब्द है, भग्न हृद्य है, सुबह हो या शाम पुकारूँ जो तुझे।
कल नही तो क्या आज ओर अभी, न जाने कब मुलाकात हो जाये तुझसे।
ख्यालों ओर ख्वाबों की दुनिया से उतरके, जो तू आ जाये पास मेरे।
तुझे में क्या दूंगा जो दिया है तूने सारा जग मैं बिना किसी कीमत पे।
अपने आपको मारता हूँ पल पल, जो अब जीना चाहता हूँ वास्ते तेरे।
लागता नहीं है दिल दुनिया में, गाहे बगाहे दौड़े दिल पास तेरे।
बीत गया न जाने कितना युग छोड़ के वतन, पक्षी की भांति फड़फड़ाऊँ पहुंचने की पास तेरे।
बेताब हो उठता हूँ, जो तोड़ दे तू, तन मन की सारी जंजीरो को।
कब तक चलेगा ऐसा, कब मैं बदलके हो जाऊंगा तेरे जैसा।
भरमाता हूँ खुद को यों ही गुम रहके, पर अब ओर दूर नही रह पाता तूझसें।


- डॉ.संतोष सिंह