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Hymn No. 3007 | Date: 25-Nov-2005
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मन के आयाम है न जाने कितना बड़ा, कब कौंन सी लहर पैदा हो जाये न जान पाये हम।
मन के आयाम है न जाने कितना बड़ा, कब कौंन सी लहर पैदा हो जाये न जान पाये हम।
कभी तूफां खड़ा कर दे तो कभी बहा ले जाये संग अपने, जब तक समझें देर हो जाये तब तक।
रखें हाथ मैं अपने, वश में नही जो सपने, ठोकर पे ठोकर खाके भी करते हैं कर्म अपने मन की।
दास्ताँ है ये सदियों पुरानी, जानने को जाने सभी, फिर भी कर न पाया कोई अपनी।
बहुत अच्छा लगता है जब मन की करते है, अनजाने में ही जन्मों की कहानी को दोहराये।
मन सा सुंदर न है कुछ संसार में जो बांध पाये इसमें, भाव में बांध खींच लाये प्रभु को।
तन का भेद मिटाके मैल जो बढ़ाया दिल से, रह जाता नहीं भेद नजरों का बरसाये जो प्रेम चारों ओर।
मन का बनाया संसार है, सुख ओर दुःख चाहे हो ओर कुछ ये सब मन के ही आयाम हैं।
अजीब खेल है ये देर सवेर जीतना है जो सबको, जो जीता वही होता प्रभु का।
कल को जो करना है करो शुरुवात वो आज से, समय जाते देर नही लगती चाहे उम्र हो कितनी भी लंबी।
- डॉ.संतोष सिंह
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