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Hymn No. 298 | Date: 22-Aug-1998
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वंदना तेरी हम सदियों से है करते, तूझे ना पूजके पत्थरों को है पूजते ।
वंदना तेरी हम सदियों से है करते, तूझे ना पूजके पत्थरों को है पूजते ।
सोये हुये मन को रहने देते है सोया, तुझे जगाने के लिए घंटी – शंखनाद है बजाते ।
दुरदुराते है तेरी सत्ता के सजीवों को, दीप, फूल – माला चढ़ाते है निर्जीवों को ।
अनुष्ठान पे अनुष्ठान करते है तेरा, मैं – मैं का राग अलापते है सदा से ।
होम कई बार किया शब्दों का, पर 'मैं’ का होम न कर पायें अब तक ।
ऐ पिता तूझे प्रणाम करके बड़ा बनना चाहते है हम दूसरों की नजरों में ।
खुद का दमन करने से काम ना है चलता, वहाँ अर्पण करना पड़ता है तन – मन का।
तेरी शरण में रहके अपना हर कार्य तुझसे अलग होके क्यों है करते ।
मन की नजरों से है तूझे देखना चाहते, अपने दिलों में तुझे बैठाना है चाहते ।
गिला तो हमें अपने आप से है, चाहा हुआ है जो तेरा उसे पूरा कर नहीं पाते ।


- डॉ.संतोष सिंह