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Hymn No. 3028 | Date: 11-Feb-2006
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हर एक तरंग में समायी है प्रेम की धुन।
हर एक तरंग में समायी है प्रेम की धुन।
यादों की थाप से निकलके बनती है नवप्रेम गीत।
अनायास ही मन मचल उठे, प्रेम की हीलोर पाके।
बेताब हो जाता है तेरे प्रेम में साराबोर होके।
शब्दों के मायने ना होते है, जो गुम होता हूँ तुझमें।
कोरा का कोरा रहता हूँ, जो अनहद का नाद गूंजे दिलमें।
रहती ना है तब कोई ओर कामना, फिर भी एक ओर जन्म चाहता हूँ।
तेरी मूरली की धुन पे, एक बार ओर रास रचाना चाहूँ।
डर ना लगे तब किसी से कुछ से, जो अखंड विश्वास होता है।
कहने को कहे दुनिया कुछ, वो तो तेरी धुन में जीता है।


- डॉ.संतोष सिंह