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Hymn No. 3029 | Date: 11-Feb-2006
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मन के भरोसे जो जीना छोड़ दिया, यारा डरना तब से छूट गया।
मन के भरोसे जो जीना छोड़ दिया, यारा डरना तब से छूट गया।
चाहे होने को कुछ होता रहे, मन की मौजों पे तैरना डूबना इक साथ सीख गया।
वश में था न तब कुछ, न है अब कुछ, पर रहते है इरादे हर पल बुलंद।
जब जब हार होती है जीवन में, तब तब ओर तेजी से वार करता हूँ जीवन पे।
एक साथ खेलता हूँ खेल जिंदगी में, पर उसी पल देखूं खेल जिंदगी का।
जो नाच नचाता था कानी उंगलियों पे, आज उसको नाचते देखूं मन के आंगन में।
डर ना रहा अब किसीको किसीका, जो मौत ओर जिदंगी में पाऊँ खुद को एकसा।
देने वाला देता रहा है सदा से, हाथ दिखाये चाहे अपने ओर परायों का।
गफलत मैं ना पड़ना है अब जो मौंजो पे जीना है।
गुजरती हुयी जिंदगी में पल पल जो प्रेम भरा प्याला पीना है।
हर श्वास में पल पल तुझको ही जीना है।
- डॉ.संतोष सिंह
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हर एक तरंग में समायी है प्रेम की धुन।
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मरने से पहले तू मर जायेगा, अगर जो जीते जी प्रभु को ना पायेगा।
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