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Hymn No. 302 | Date: 24-Aug-1998
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इक् दिन मैंने ये सोचा अणु – परमाणु अपने परिधि में क्यों है घूमते ।
इक् दिन मैंने ये सोचा अणु – परमाणु अपने परिधि में क्यों है घूमते ।
कोई एक अकेला बीच में रहके टिमटिमाता है, इस नियम को है सदा निभाना ।
क्यों धरती - चाँद सूरज का है चक्कर लगाते इन सब को लेके सूरज पूरे आकाश मैं है घूमता
क्यों हम मंदिरो में जाके और हाजी काबा का है प्रदिक्षण करतें ।
जीव हो या अजीव, हम सब अपनी सृष्टि को झूम – झूमके करते है प्रणाम
परम् की सदियों से हम सब प्रदक्षिणा करते है और इस परंपरा को निभाते है ।
वो ऊपर ना है ना ही नीचे, न दायें-बायें वो तो हमारे मध्य में है ।
चुपचाप वो रहता है, करम करते हुये भी अहसास ना होनें देता हूँ ।
हमें भी हर कदम करते हुये झूमना पड़ेगा उसके संग इस विश्वास से तो है मध्य में हमारे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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मत रोक अपने आपको, तू इतना बहना पड़ेगा उसकी ओर एक ना एक दिन ।
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कुछ सुनना चाहता हूँ कुछ सुनाना चाहता हूँ, तेरी सरपरस्ती में जीवन गुजारना चाहता हूँ ।
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