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Hymn No. 303 | Date: 24-Aug-1998
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कुछ सुनना चाहता हूँ कुछ सुनाना चाहता हूँ, तेरी सरपरस्ती में जीवन गुजारना चाहता हूँ ।
कुछ सुनना चाहता हूँ कुछ सुनाना चाहता हूँ, तेरी सरपरस्ती में जीवन गुजारना चाहता हूँ ।
जो कर सकूँ ना मैं, वो तू है करवा सकता, दिल से कहा हुआ कर दिखाता है तू पूरा ।
जीवन जो तेरा बनके गुजारा, हर मौके बेमौके पे याद जो तेरी आयी, पायेंगे सत्य अपने तू तू समझे।
डरना कीस बात के लिये, जो चाहेगा तो वो तो हाके रहता है, मौका रहते जी भरके प्यार करना तुझसे।
वादे को निभाना न आया हमें, मन को दिल से जोड पाया, प्रभु तेरी कृपा से तेरे पास आयें।
हठ ना करता हूँ हर आहट पे ध्यान आता है तेरे आने का।
मन से मन निकलता जा रहा है वो शांत – अचल होके तेरे करीब होता जा रहा हूँ ।
आशिकी का रोग लग गया है मुझको, इसकी दवा – दारु तेरे सिवाय कोई ना कर
अपनाने की फिक्र ना है मुझे, बेगाना बनके गाता फिरुँगा तेरा नाम ले लेके ।
रंज और गम मन का मिटता जा रहा है जैसे – जैसे प्यार बढता जा रहा है तुझसे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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