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Hymn No. 304 | Date: 25-Aug-1998
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मन में बहुत कुछ है तेरे लिये, तब तक आते – आते शब्द हो जाते है गुम,
मन में बहुत कुछ है तेरे लिये, तब तक आते – आते शब्द हो जाते है गुम,
गम हो जाता है मुझे, जब मैं हर बात पूरी ना कह पाता हूँ तुझसे ।
मन तडप उठता है, बस आह ना निकले, बाकी सब कुछ हो जाता है तेरे लिये,
नैन भीग जाते है, जब हमें तेरी याद आती है, टपकना चाह के भी टपक ना है पातें ।
अरे मेरे प्यारे, मेरा प्यार अधूरा ही सही, कम से कम प्यार है तो सही,
जो वक्त कभी तेरी यादों में कट जाता था वो काटे नहीं कटता, बेसर्बी सी छा जाती है मुझपे ।
मन भटकता है यहाँ – वहाँ, हैरान कर देता है मुझे मन का ये पहलू कभी – कभी,
जीतने की बात आयें कभी तो मैं मन को जीतूँ तेरा साथ पाने के लिये ।
हारने की बात अगर हो कभी, सब कुछ हारनें से अच्छा है, मैं खुदको हार जाऊँ तुझसे;
गिला नहीं कीसी बात का कीसी से, बस मेरा दिल तुझमें हिलमिल जाये ।
भाने को तो है सब कुछ भाता, पर तेरे बिना इस मन को कुछ ना है सुहाता;
दुनिया है साथ मेरे तो क्याँ, मुझे तो बस तेरा साथ चाहिये ।


- डॉ.संतोष सिंह