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Hymn No. 308 | Date: 27-Aug-1998
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मुझ जैसे हजारें हजार मिल जायेगे तेरी सेवा के लिये,
मुझ जैसे हजारें हजार मिल जायेगे तेरी सेवा के लिये,
वो तो तेरी कृपा थी तेरे, दर पे पहुँच गये हम ।
इस नाचीज की कोई औकात ना थी, जो कुछ भी बना,
वो तो तेरी नज़र पड़ेन के बाद है बना ।
पिता कीसी भी कोने से हम तेरे लायक न थे;
एक कीड़ा था जो मानव तन में रहता था ।
वो तो तेरी कृपा हुयी जिसे मानव रूप में स्वीकारा सभी ने ।
अपरंपार हैं तू, तेरी कीर्ती की चर्चा सर्वत्र है,
हम जैसे अरबों – खरबों आयेंगे, चले जायेगे, पर ना कर सकते तेरा बखान ।
तूझे पुकार – पुकार के खुद को ऊपर उठाना चाहते है;
कीतनी भद्दी है हमारी लालसा, तू तो सब कुछ माफ कर देता है हमें ।
इतना विशाल है तेरा ह्रदय, जिसमें समाया सारा ब्रह्माण्ड
खान है हम गलतियों की, फिर भी तू देता है स्थान अपने जग में ।
तेरे बारे में क्या लिखूँ मैं, लिखते चले आये है बड़े – बड़े ऋषि मुनि
हम तो तेरे दर के एक कीड़ा बनके है खुश ।
हमारे में इतनी ताकत नहीं, कर सकें तेरी चाकरी, वो तो तेरा आशीष है ।
पल दो पल लेते है गुजार तेरे सान्निध्य में ।


- डॉ.संतोष सिंह