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Hymn No. 310 | Date: 27-Aug-1998
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फीकें है तेरे आगे दुनिया के सारे ऐश्वर्य, स्वर्ग भी माया का जाल नजर आता है तेरे सामने ।
फीकें है तेरे आगे दुनिया के सारे ऐश्वर्य, स्वर्ग भी माया का जाल नजर आता है तेरे सामने ।
fिजसने तेरे सान्निध्य में पल दो पल गुजारा, उसको इस धरा का सबसे बडा खजाना मिल गया ।
तेरे अमृत से बोल जिसने सुना उसने हर कथा – पुराण यूं हि सुन लिया बिना कीसी श्रम के ।
इतना दयालू है तू बिन बतायें दे जाता है ; हमें सब कूछ, अहसास भी ना होनें देता हें हम मुरखों को।
प्रेमी तू इतना रीझ जाता है हमारे झूठे प्रेम पे, हर कर्मों की दीवार तोड़के अपना लेता हें तू हमें ।
ज्ञानी तू सबसे बडा घटता है तुझमें भूत, वर्तमान, भविष्य, हमारें सब पापों को बूझतें हूयें तू देता है शरण ।
हर पल तू करता है हमारा कल्याण, थोड़ी सी विपत्ति आते ही हम दोष देनें लगते है तूझे ।
तू निमग्न रहता है सदा अपने निज आनंद मैं, हर भेद – भाव से उपर तू लुटाता है अपने आपको सदा ।
क्षूधा हमारी ऐसी है जो शांत न होयें कभी, बिन ध्यान दियें तू दें देता है हमें बहुत कुछ ।
इक् बात हूँ मैं दिल से कहता, अब आनंद आता है तेरा नाम लेनें में कृपा चाहता हूँ सदा ध्यान रहे तेरा ।


- डॉ.संतोष सिंह