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Hymn No. 313 | Date: 28-Aug-1998
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दिल की गली में हें खलबली, चर्चा चली है बस तेरी ही तेरी ।
दिल की गली में हें खलबली, चर्चा चली है बस तेरी ही तेरी ।
मन के दरवाजों को खुला छोड दिया हूँ, आनें के इंतजार में तेरे।
बेकरार हो रहाँ हूँ, हर आहट पे चौक जाता हूँ ।
तेरे बिन सब कुछ है सुना, बाहर से पुकार रहा हूँ, भीतर कोहराम सा मचा है।
ओठों पे मुस्कान है, बुध्दि दें रहीं दिलासा।
दूर रहके भी तू पास हें रहता, तेरा संग दिल को है लुभाता ।
तन अटक गया कूछ देर के लिये विषयों में पर उसको भी उस में मजा नहीं आता।
सजा जो भी दिया तूने तो तो प्राणों से भी है प्यारी ।
पता नहीं कैसे भटक जाता हूँ मैं, पर तेरी दया से पास तेरे चला आता हूँ मैं ।
तू रहम कर या दें कोई भी सजा, पर पास रहनें दें हमें तेरे ।
काबिल ना हें हम तेरे लिये, तू एक नाकाबील को गूलाम बनाकें रख लें ।
- डॉ.संतोष सिंह
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