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Hymn No. 314 | Date: 29-Aug-1998
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झन्म लेते ही नाता टूट जाता है तूझसें, जकड जाते है श्वासों के फेरे में
झन्म लेते ही नाता टूट जाता है तूझसें, जकड जाते है श्वासों के फेरे में
अपने परायें का भेद उभर आता है, मन के संग मचलते हें हम ।
तन के हर बंधन में बंधते ही जन्म लेतें है हर रिश्तें नातें ।
विशालता अपने आप हो जाती है खत्म, क्षुद्रता का होता है जन्म ।
भरण – पोषण करत है, इच्दाओं और स्वारथ की वही मांग तुझसे है दोहरातें ।
खूद को भूलें रहतें है, यहाँ – वहाँ मिथक भरें मान्यताओं का पूजतें है ।
असत्य की पट्टी होती है आंखो पे, असफलता हाथ आतें ही दोष देते है तूझे ।
विश्वास देखनें के लिये रहतें है बैचेन, तेरे पास पहुंचने को क्यों नही करिश्मा समझाते ।
बांध लेते है खुदको मांगो में, भाग तुझसे करत रहते है ।
अगर मरना – जीना सत्य है, तू तो परम् सत्य है ।
स्वीकार कर इसे क्यों नहीं खूद को तेरे सहारे हं छोडे देतें।


- डॉ.संतोष सिंह