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Hymn No. 316 | Date: 29-Aug-1998
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तेरी वंदना करतें है हर कोई अपने – अपने ढंग से ;
तेरी वंदना करतें है हर कोई अपने – अपने ढंग से ;
उन सबको प्रणाम करकें करूं में तेरी वंदना ।
कोई तूझे नहलायें भांति – भांति के सुगंधित द्रव्यों से;
मेरे पास तो बस प्यार का क्षुद्र जल है, वो भी अर्पित करूं तेरे श्री चरणों में।
सजाते है लोग सुंदर से सुंदर पुष्प – मालाओं से तुझको;
उस तूच्छ के पास आसुओं के बूंदों की दो कली है, चूपकें से गिरा देता हूँ तेरे दर पे
अनेकांनेक कीमती वस्त्र – आभुषण पहनाते है लोग तूझे;
मैं मुरख श्रध्दा की चद्दर चढाके तूझे होता हूँ खूश।
कीतनें दरिया – दिल है मेरे भाई - बहन, एक से एक पकवानका भोग लगाते है तूझे;
मैं पागल तुझको सौंप देता हूँ अपना भोजन, फिर झट से खा लेता हूँ ।
एक से एक महान तेरे भक्त, सबकी महिमा, अनोखी प्यारी;
मैं क्षुद्र से मांनु की तेरी भति में ही है सबकी भक्ति, जो है सबसे प्यारी।


- डॉ.संतोष सिंह