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Hymn No. 317 | Date: 30-Aug-1998
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डरतें है बननें से लोग रोगी, हम तो तेरे नाम का रोग लगायें बैठे
डरतें है बननें से लोग रोगी, हम तो तेरे नाम का रोग लगायें बैठे
तेरे पास आनें के लिये हर उन दूर्गम रास्तों से जा गुजरेंगे, जहाँ से लौटना है मूश्किल।
तेरे लिये वो सब कूछ कर गुजरेंगे, जिनकें वास्ते नामुकीन शब्द है बना,
टकरा जायेगे उन परवतों से, जो तेरे – मेरे बीच दीवार बनकें है खडी ।
जो लडाई हमने कभी ना लड़ी, लड जायेगे तेरे लिये परिणाम की परवाह कीये बिना;
तूझे पानें के लिये धम की हर बेडियाँ तोड़के, सच्चे धरम में शरण लेंगे हम।
जब तक आखरी दम रहेगा हममें, एक – एक कदम बडते रहेगे तेरी और,
शत्रु के पास जाना पड़ा तेरे वास्तें तो सर झुकायेंगे उसके श्री चरणों में ।
अपनों ने भी रोग डाला तेरे – मेरे बीच में, झिझक ना करेंगे त्याग करने में;
मेरा दिल जैसा भी है अब बस तेरा है, उसका एक – एक कौना गुलजार है तुझसे ।
बीतनें को बीत जाने दुंगा दर जन्म, पर तेरा नाम लेता रहूंगा हर पल,
मिलन की परवाह ना है मुझे, जुदाई में तेरा नाम और तू रहेगा कम से कम ।


- डॉ.संतोष सिंह