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Hymn No. 318 | Date: 30-Aug-1998
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मेरा प्रभु डर पल रहता हें साथ मेरे, निभा नहीं पाता में ही इस रिश्तें को ।
मेरा प्रभु डर पल रहता हें साथ मेरे, निभा नहीं पाता में ही इस रिश्तें को ।
नाता है हमारा, उससे सदियों पुराना, रह – रहके दूर हो जाता हूँ मैं उससे ।
ख्याल करता है वो हर पल मेरा, अपने में उलझकें हम भूल जातें है उसे ।
कभी उसने गम ना किया, हमारी कीसी बात का, और हंसने तानें मारे बात बें बात पैं ।
जान पे बन आती है तो उसके कदमों में है गिडगिडातें, सब भूलाके देता है शरण वो ।
आनंद का है वो दाता, हर दूखों में भी रहना सीखाता है आनंद में ।
निर्गुण खुद रहता है, हमारें सुख के लिये हर गुणों का उपहार देता है ।
ध्यान रखें वो हमारा अपने ध्यान में, हममें हर दोष का है भान कराता।
ज्ञान का है वो एकलौता दाता, अज्ञान से दूर रहना सीखाता।
प्रेमी उससे बडा कोई नहीं, माने या न मानें हम उसे वह कल्याण करता है सबका।


- डॉ.संतोष सिंह