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Hymn No. 319 | Date: 31-Aug-1998
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चाहते है हम सब कूछ तेरा होके, तुझसे अलग कूछ ना स्वीकार हमें,
चाहते है हम सब कूछ तेरा होके, तुझसे अलग कूछ ना स्वीकार हमें,
सुख भी चाहें तेरा होके, दूख का भी साथ हो तेरा बनकें,
तुझसे अलग कूछ भी ना है, तेरे संसार के यें सब इक् पहलु है,
क्या अच्छा, क्या बूरा, हर एक का अपना अलग मजा;
सजा तो बस एक है, इस तन में रहके तुझको भूल जाना;
जिंदगी में आयें कोई भी दौर, हर एक का अपना – अपना मजा है ।
दगा देती हें ता इच्छामें, जो साथ मन को लें दौडती,
इक् बार जो शरण में तेरे आया, वो फिर तेरा हो जाता है ।
अनंत विशाल है तू, तुझमें ही होती है ब्रह्माण्ड की हर हलचल;
हर भेद को भूलाकें सबको एक समान स्वीकार करता तू।


- डॉ.संतोष सिंह