VIEW HYMN

Hymn No. 321 | Date: 01-Sep-1998
Text Size
बहुत विश्वास हं प्रभु तुझप, खूद पे ही ना विश्वास है ।
बहुत विश्वास हं प्रभु तुझप, खूद पे ही ना विश्वास है ।
तुझप जो विश्वास है, उसको ही अपना बनाकें जीना चाहता हूँ ।
नफा नुकसान से दूर रहके, तूझपे विश्वास करना चाहता हूँ ।
उस विश्वास के सहारें तेरे परम् प्रेम का एक – एक घूंट पीना चाहता हूँ ।
हौले – हौले उस विश्वास के पतवार से अपनी नैय्यां खैनां चाहता हूँ ।
आयें तूफां कीतना भी जीवन में, टूंटे ना विश्वास की पतवार ।
बेरोक – टोक विश्वास के थपेडाs के संग तेरी और बडते रहना चाहता हूँ ।
आहत ना कर सकें कोई आंधी या तूफां इतना विश्वास मूडते हो तूझपे ।
मैं अनाड़ी नया – नया खिलाडी, तूझपे विश्वास रखकें बड चला है तेरी और।
छोर नजर न आयें तो क्याँ से, विश्वास की डोर थामें रहूँ सदा मैं ।
मुझे पता है तू ना छोड़ेगा, हम हीं घबरा के छोड देते है विश्वास को ।
मैं नासमझ जाख – बाख बार छोडूं विश्वास को, पर तू जके दे मूझे परम् विश्वास में।


- डॉ.संतोष सिंह