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Hymn No. 323 | Date: 02-Sep-1998
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दर – दर के भटकें हुये को तूने शरण दिया अपने दर पे,
दर – दर के भटकें हुये को तूने शरण दिया अपने दर पे,
ठुकराया गया हर जगह से, उसको स्वीकारा अपने श्री चरणों में ।
मन भटकता था बहुत यहाँ – वहाँ, स्थिर हुआ तेरी दया से;
पेशोपेश में रहतsिंाा, हर पल संकून मिलता है दिल को चर्चा करकें।
अजीबो – गरीब हालत पैदा होते थें और बिखर जाते थें हम।
दिलाया दिल को दिलासा तूने, तेरे नाम के सहारे संवर गये हम।
भावूक है हम, भीतर ही भीतर रोया करते थे;
कोरी भावूकता को छोड तूने वास्तविकता को गले लगाना सीखाया।
क्याँ – क्याँ तूने ना किया, इस नाचीज को तूने खाक से उठाया;
संयम – श्रध्दा और जीवन के हर पहलू का तूने पाठ पढाया ।


- डॉ.संतोष सिंह