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Hymn No. 324 | Date: 02-Sep-1998
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सोच के क्या होता है, जो सोचा था वो ना होता है ।
सोच के क्या होता है, जो सोचा था वो ना होता है ।
हर आदत को बदला जा सकता हें इबादत के सहारें ।
मिला हुआ खो सकता है, सद्गुरू के चरण में शरण जो मिला।
जो न पाया था वो भी मिलता है, दिल इक् बार को जो जुड गया उससे ।
बिना कुछ कहें मस्ती में रहते है, जिसके लियसें तरसते है देवता भी ।
बयां करना मुश्किल है वह सब कुछ सीधा – सरल सा रहता है ।
पास रहो या दूर उसकें, जब सर पे हाथ हो उसका।
मन का हर डर निकल जाता है, दिल पगलाया सा फिरता है आगे – पीछें उसकें ।
एक अजीब सी धून में रहते है, जीवन जीनें का अहसास भी ना रहता।
हमारें साथ सदा वो रहता, व्यवहार अव्यवहार से परें उसकें अनुरूप होते है हम ।


- डॉ.संतोष सिंह