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Hymn No. 326 | Date: 02-Sep-1998
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ऐं हमारें परम् पिता तू हमारें लिये क्या ना है करता;
ऐं हमारें परम् पिता तू हमारें लिये क्या ना है करता;
सब कुछ तू है सहता, रहके तू इस मानव तन में ।
करम करत है हम, भार सहता है तू सीख कूछ ना है लेतें,
एक बार नहीं कई - कई बार इसी कहानीं को है दोहरातें ।
जानतें है सब कूछ, पता नहीं मन कब जा फिसलता है अबूझ कर्मो में,
रूकना चाहते है रूक नहीं पातें होतें है नियतीं के शिकार ।
प्रभु कब तक चलेंगा हमारें भीतर यें, अंतरद्वंद, उकता गये है इस खेंल से,
सच्चे दिल से शरण चाहता हूँ प्रभु तेरे चरणों में ।
भोग हर जन्म है भोगा मन ना भरेंगा कभी, प्रिय अजीज आ गया हूँ ।
दिल को रूचता नहीं तेरे सिवाय कूछ, दें दें प्रभू तेरा सान्निध्य हमें ।


- डॉ.संतोष सिंह