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Hymn No. 328 | Date: 03-Sep-1998
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अभी दभ बहुत बाकी है, हमारें दंभ को निकाल दें;
अभी दभ बहुत बाकी है, हमारें दंभ को निकाल दें;
अढा हूँ घोड़ें की तरह अपनी झूठी जिद पे, उस जिद को मिटा दें।
मान – अपमान का बोध होता रहता है मन को, इस बोध को भूला दें;
झूठीं ख्यालें को छोडके, सच्चाई से रूबरू होउँढ में ।
fितलांजली दे दूं मैं मेरे सारे भेदों को, एकरूपता आ जाये,
अंदर बाहर का फर्क मिट जाये एकसाँ रहूँ में
जतन – करना और गवाना को भूलाकें तूझे अपना बना लूं;
भूला दूं मोहब्बत और दूश्मनी को, यार बना लूं सबको अपना।
तेरी याद रह जाये मुझमें, मैं खुद को भूला दूं ऊसमें;
हर मोह को त्याग के, बस तेरा मोह रह सदा हममें।


- डॉ.संतोष सिंह