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Hymn No. 332 | Date: 05-Sep-1998
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मैं नासमझ कूछ न जानूं, जो कूछ भी जांनू उसको न मानूं,
मैं नासमझ कूछ न जानूं, जो कूछ भी जांनू उसको न मानूं,
है बुध्दि अल्प मेरी, फिर भी हर बार यें कहूंगा तू मेरा मैं तेरा ।
तेरा – मेरा नाता है सदियों पुराना, मन के तूफां का मारा फिरता में इधर – उधर।
हमें है सब कूछ कबूल, जो कुछ भी हुआ, जो भी होगा तेरी मरजी से।
हम अज्ञानी मूढ है, दिया तूने हर बार सहारा;
तूझे छोड के विषयों के पीछे भागे हम, फिर भी तूने ना किया कोई गिला।
ऐं ब्रह्माण्ड के स्वामी दया - दृष्टि रखना, हम मुठो पे सदा।
कैसे भी है – है तो तेरे, तू चाहेगा तो हम भी हो जायेगे भीतर बाहर से पावन ।
नाश करना है तो कर दे तन – मन की बुराइयों का, अच्छा बननें के वास्ते ना है कल।
कुछ भी घट जाये हमारे संग सहजता से स्वीकारें, सरलता पूर्वक रहे हम सबके है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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तेरे नाम की महिमा अबूझ अपरंपार है, फिर तेरा क्याँ कहना ।
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तू जिरानंद होके भी आनंदमय है, तुझसा सहज सरल कोई ना है ।
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