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Hymn No. 333 | Date: 05-Sep-1998
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तू जिरानंद होके भी आनंदमय है, तुझसा सहज सरल कोई ना है ।
तू जिरानंद होके भी आनंदमय है, तुझसा सहज सरल कोई ना है ।
भेद है तुझमें, पर अभेद हें तू, हम अज्ञानी क्या जाने ज्ञानमय है तू ।
तू अकाल, हर काल में मिटकें रहता सदा, अमिट तेरी छत्र छाया, जो पाया खिला कमल समान।
रहता है तू संग – संग सदा हर कोई न जाने यें, जिसनें जान हर पल पाया उसने तुझको।
अबूज्ञ है तू बुझनें जो निकला तूझे उs बडा अज्ञानी ना, जिसनें तेरी कृपा हुयीं उसनें जाना –
ऐं पुरन परमात्मा है तू हर यूग में नित्य नयें – नयें रूप धरके आता । - सबकूछ।
करमों के मारे हम अभागे, दोष ना देतें तूझे, मोगे तुझसे तेरे चरणों की रज ।
न पानें के लायक है तूझे ना हि स्व को जानते, फिर भी हम तूझे है चाहते ।
हमारें अंदर छूपे हूयें तेरे प्रति प्यार का उभारदें, उसके सहारे गोला लगाये हम तुझमें।
सजा जो देनी है दें दें, हमारें सब्र को तोड़ दें, हम अविरल तेरे प्यार में बहतें चलें जाये।


- डॉ.संतोष सिंह