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Hymn No. 335 | Date: 06-Sep-1998
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पुजा में तू पुजा मत कर, पुजा करने बैठा तो सिर्फ पुजा कर,
पुजा में तू पुजा मत कर, पुजा करने बैठा तो सिर्फ पुजा कर,
इस जग में पुजनें लायक तो बस वो इक् ही है, जो सर्वत्र है।
पुजतें – पुजतें अपनीं वासनाओं की पुजा तू मत कर;
पुजा में कोई काम ना है, यें तो दिल से खिला हुआ फूल है ।
प्यार पाकें ये बडता है, भाव के झोकों के संग खिलता है ।
श्रध्दा सहारा है इसका, दिन पे दिन लहलहा के झूमता है उसपे ।
इससे बडा कोई चडावा ना है, इसे पाकें परम् भी झूमता है;
इच्छाओं को त्याग के परम् विश्वास से तू कर पुजा उसकी।
जीवन के हर उठा – पठक के संग निभाते हुये दृडनिश्चयी बनकें करनी पड़ेगी पुजा
पुजा में सिर्फ पुजा कर उस परम् पुजनीय की जिसमें समाया यें ब्रह्माण्ड ।
जैसा तेरा हर पल ना बीतें उसकी पुजा के बिना, वो भी बांट जोहेंगा तेरी पुजा का;
ना जरूरत है पुजा के लिये कीसी साधन की, बस साधना होता है मन की।
ना ही कोई विशेष समय निकलना पड़ता है पुजा के लिये, ये जब – तब है कर सकतें ।
पुजा से बडके ना है कूछ, सच्ची पुजा ही सब कूछ है।
पुजा का प्रसाद आनंद है जिसनें किया वो खो जाये परम् आनंद में ।


- डॉ.संतोष सिंह