VIEW HYMN

Hymn No. 338 | Date: 07-Sep-1998
Text Size
दिल ही दिल में कहता रहता हूँ मैं तुझसे बहुत कुछ,
दिल ही दिल में कहता रहता हूँ मैं तुझसे बहुत कुछ,
क्या यें सच है तू सुनता है सब कुछ, यें समझ ना हूँ पाता।
सुना हें तू, कण – कण में है बसता, तो क्या तू मेरे नजदीक भी है रहता;
लगता तो है मुझे, फिर भी मैं कुछ नहीं जान पाता।
कहतें है सब तू ही इक् है करता, बाकी तो निमित्त मात्र है,
फिर भी हम यें ना है जान पातें, क्यों करमों का भोग है भोगना पड़ता।
खेल यें कैसा तू है खेलता, हारता हें सदा से, पर तू ही है जीतता;
हम शिकार करते है खुद का कर्मों के बाणों से, तम के अंधेरे में।
दोष ना ही देतें है तुझको, पर यें सोचते है हम कहाँ फंस गये;
इसमें भी है तेरी मर्जी तो बस हमें निभाना सीखा दें राजी-खुशी से इस जीवन को।


- डॉ.संतोष सिंह