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Hymn No. 339 | Date: 08-Sep-1998
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बडती जा रहीं है हमारी मजबुरी, हर रोज कोई ना कोई कारण है खडा;
बडती जा रहीं है हमारी मजबुरी, हर रोज कोई ना कोई कारण है खडा;
तन के घेरे में बंध गये है हम, तोड़ना चाहते है तोड़ जा पा रहे है ।
इक् तरफ तू है, इक् तरफ तेरी बनायी दुनिया, दोनों के अपने-अपने कायदें कानुन
कौन सच्चा, कौन झूठा, पर दोनों ही जिंदगी के दो पहलु है ।
इक् तो सदा सत्य, दूजा नश्वर सत्य हें निभाना है दोनों को;
आज नहीं तो कल स्वीकार कर चलना पड़ेगा इस रास्ते पे अकेले ।
यहाँ – वहाँ भटकने से अच्छा है, सद्गुरू कें चरणों में खुद को सौंप देना;
प्यार से निराशा के हर बांधा को तोड़के जगायेंगा वो हमको ।
प्यारी प्यारी गीत सुनायेंगा, गीत के सहारे आगे बडना सीखायेंगा,
उसके गीत में सुर मीलाते – मिलाते कदम खुद ब खुद चल पड़ेंगे।
तब अहसास ना होगा गानें का न चलनें का इतना हिलमिल जायेगे हम उसमें ।
ना पहुचनें की जल्दी होगी, ना ही देर का डर, हर दूरी हो जायेगी पलक झपकते समय।
- डॉ.संतोष सिंह
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