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Hymn No. 340 | Date: 08-Sep-1998
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हर इक् का अपना – अपना सत्य होता है,
हर इक् का अपना – अपना सत्य होता है,
अपने – अपने सत्य को त्याग के, सदा सत्य की तरफ बडना पड़ता है ।
क्षुद्र हो या विकसित, जीव हो या अजीव कोई ना रूका है ।
हर कोई अग्रसर है उर्ध्व की ओर, अनेक गतियाँ करके बड रहे है इक् और।
अच्छा हो या बुरा सबने पाया उसके संसार में जगह।
जब उसने भेद ना किया, तो क्यों भेद हम पैदा करें अपने दिलों में ।
हमनें ही उससे लाख – लाख बार नाता जोडा और तोड़ा ।
पर उसनें ना कीसी से नाता तोड़ा ।
राह चाहें जो भी हो हम सबकी जातें है उसके दर की ओर।
आज नहीं तो कल चलना पड़ेगा उसपे हम सबको ।


- डॉ.संतोष सिंह