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Hymn No. 342 | Date: 09-Sep-1998
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मैं ना निकला हूँ तूझे जीतनें, निकला हूँ मैं तो अपने आपको तुझपे लुटानें;
मैं ना निकला हूँ तूझे जीतनें, निकला हूँ मैं तो अपने आपको तुझपे लुटानें;
मेरी हैसीयत कूछ भी ना है, दया दृष्टि हो अगर तेरी खुद को तुझसे जोडना चाहता हूं ।
तुझसे मन्नत कुछ ना है मांगना, बस तेरा आशीष चाहीयें, तेरे चरणों में फूल बनकें चंढू।
हवालें में अपने आपको करना चाहता हूँ तेरे, चाहें सहनी पड़े दुनिया भरकी दुशवारीयाँ ।
सैलाब आयेगा इस जीवन में कई कई बार, मैं तो घास का तृण बन बहता चला जाउँढगा तेरा नाम लेके।
डर क्या होता है मैं क्या जांनू, जब तू है हर पल मेरा संग तो कीस बात का डर ।
क्या होगा, क्या नहीं बेदम सी है यें सब बातें, जब हो गये तेरे सहारें तो सब अच्छा होगा।
ज्ञान की बात ना है मुझे करनी, मैंने तुझसे प्यार किया है बस प्यार ही करते रहना चाहूँ ।
जो कुछ भी पाया तुझसे ही पाया, तूझपे लुटाकें क्यों गर्व करूं मै, मैं तो मेरे मे को लुटाना चाहूँ।
कुछ कर दे तू ऐसा यहाँ वहाँ, जहाँ तहाँ, भटकता फिरूं हाल बेहाल हो बस तेरा ख्याल हो।


- डॉ.संतोष सिंह