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Hymn No. 346 | Date: 11-Sep-1998
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दिल मचलता है जैसे – जैसे कदम बडते है तेरे दर को ओर,
दिल मचलता है जैसे – जैसे कदम बडते है तेरे दर को ओर,
कदम से पहले मन पहुंचे तेरे दर पे बार – बार तूझे प्रणाम करते हुये।
अंकुश ना रख पाता हूँ, बांवरा बनके झूमता हूँ तेरे संग मिलनें पे;
रोम – रोम मेरा खिल उठता है उन्माद सा छाने लगता है तेरा गीत सुनते ही।
बयां करना मुश्किल है मैं वहीं का वहीं रहता हूं, पर कुछ हो जाता है।
हौलें – हौलें मुझपे अधिकार मेरा खतम हो जाता है, मैं तेरा हो जाता हूँ ।
वक्त कैसे गुजर जाता है, बिछुडने के पल होश हमें आता है ।
आनंद कहुँ या सुख तुझसे अलग रहते हुये कभी नजर नहीं आता है ।
तरसता हूँ तुझसे दूर रहनें पे, हर पल संग चाहता हूँ मैं तेरा।
उत्कंठित मन को शरण दें, तेरा साथ पानें के लिये कूछ भी करनें को तैयार हूं मैं।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्रभु देना है तो दें दे मुझे तेरी भक्ति, मन में तो कई बार संताप है जनमते,
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