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Hymn No. 348 | Date: 11-Sep-1998
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दीवानों को परवाह ना होती है अंजाम की वो तो सर पे कफन बांध के है निकले।
दीवानों को परवाह ना होती है अंजाम की वो तो सर पे कफन बांध के है निकले।
भीड़ का हिस्सा बनकें हर कोई है चलता, कोई दीवाना ही अकेला चला करतें है।
अपनों की सलामती के लिये लोग मांगते है दुआ, दीवानें खुद मिटकें लोगों की सलामती।
डर से दामन हर कोई है पकडता तेरा, दीवानें तो अपना सब कूछ लूटातें है मुहब्बत है ।
मौज के सिवाय दीवानों को कूछ ना है सूझता, हर मुश्किल में बस वो हसंता ही रहता है।
कहता नहीं बहुत कुछ चुपचाप है सुनता, पर करता है सबकें मन की, अपना ही होश नहीं रखा।
अमानत कोई ना चाहीयें उसे वो तो प्यार है लुटाता तूझपे, प्यार का ही तो है वो दीवाना।
करता है अपने दिल की रहके जमानें के संग, जुड़ा रहता है दिल से वो तो तुझसे।
शरमाना उसे आता नहीं करीब जैसें अपने तूझें है पाता इजहार कर बैठता है अपने प्यार।
जीवन जीनें की उसे ना पड़ाr रहती है वो तो हर पल डूबा रहता है तेरी मस्ती में।
- डॉ.संतोष सिंह
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