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Hymn No. 350 | Date: 12-Sep-1998
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कहनीं हो तुझसे कोई बात, तो क्यों परवाँ करू लोगों की,
कहनीं हो तुझसे कोई बात, तो क्यों परवाँ करू लोगों की,
भीड़ में भी तुझसे कहुँगा, लोग हंसते है तो हंस लेनें दो।
जब दिल में बा आ गयी, बिन कहें मैं मानुगा नहीं;
अच्छी हो या बुरी सबकी सब कह दूंगा मा तुझसे ।
तुझसे क्याँ छिपाना, तूझे क्या बताना है ।
तू तो है सब कूछ जानता, हमारा कीरदार तू ही तो लिखता है।
मजेंदार पल होता है जब कहनें के लिये तेरे साथ जो रहता हूँ
दिन हो या रात मैं अपनीं हर बात तुझसे कहता हूँ ।
राहत ना मिलती बिना कहें, सह सकता हूँ सब कुछ, मान नहीं सकता।
जो कुछ भी हो होनें दा मुझें मेरे दिल का हाल कह लेने दों।
- डॉ.संतोष सिंह
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एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार नहीं कई - कई बार पुकारा करेंगे हम तूझे।
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भूल जा तू सब कुछ, याद रख बस उसे, जो होना होगा होके रहेगा।
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