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Hymn No. 355 | Date: 14-Sep-1998
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बदलतें है हम बदलती है दुनिया, बदला ना है वो कभी ।
बदलतें है हम बदलती है दुनिया, बदला ना है वो कभी ।
जस का तस रहेगा, एक दुनिया मिटेंगी, एक का सृजन करेंगा।
बह जायेगा कीतना पानी नदियों से समंदर में, पर तय है उन सबका मिटना ।
वो सदा है सदा ही रहेगा, जानने – मानने वाले रहे या ना रहे ।
अकाल, अनित्य शाश्वत सदा से है, हर रूप उसका अपना है ।
वहीं बनता मिटता हर भोग को खुद ही भोगता, रूप बदलता तरह तरह कें।
सबका जन्मदाता है वो, सब शरण पाते है उसमें ।
कोई अलग ना है उससे मानें या न मानें सबको जीनें का हक देता है वो।
वह निश्चिंत निराकार है, हर पल उसमें सृजन संहार का खेल जारी है ।
अभेदय होके भेदय है, ज्ञान और प्यार के आगे ।
नियत् है सब कुछ, गिनती का अंत है पर वो शुन्य होके सब कूछ है ।
अंदर भी वो, बाहर भी वो, उसकें लिये कहीं नहीं ।
कीसी को मिलें घर बैठें, कीसी ने छान मारा जग सारा ।
उसकी मर्जी है, मर्जी के बिना पता तक ना है हिलता, मौज में रहे सदा।
- डॉ.संतोष सिंह
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