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Hymn No. 359 | Date: 16-Sep-1998
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घी का दीप दीखाऊँ मैं तेरे सामनें, प्रेम की ज्योत् जला दें तू मेरे मन में।
घी का दीप दीखाऊँ मैं तेरे सामनें, प्रेम की ज्योत् जला दें तू मेरे मन में।
भांति – भांति के फूल चढाऊँ मैं तूझे, प्यार का अंकूर रोप दें मेरे दिल में ।
सुनाता हूँ मैं तूझे तेरी कथा कई - कई बार, गढ दें तू हमें प्रीत की कहानी में एक बार।
रोज – रोज तुझको कोई न कोई गीत सुनाऊँ, ढाल दे इस जीवन को तेरे मन की तरंग में ।
मैं व्यर्थ बना बोझ इस धरती पे, तू चाहें तो मुझे धिरका दें तेरे गीतो पे ।
मेरे मै को तू मार दें, चाहें प्यार से या ज्ञान के डंडे से, मैं तूझपे हूँ छोडता।
अगरबत्ती की तरह जलकें राँख बनूं बैठकें तेरे सम्मुख, सार्थक हो जाये जीवन मेरा।
मेरे प्यार को तू तेरे प्रति बढाता चला जा दीपक की रोशनी की तरह ।
मुझे हर वो बात मजुर है तेरी, जो तू मुझसे है चाहता।
में काबील नहीं इतना जो सफल हो जाये तेरे इम्तहा मैं ।
में मुरख हर पल तेरे प्यार का प्रसाद ग्रहण करकें प्रयत्न करूंगा, श्री चरणों में रहनें का।


- डॉ.संतोष सिंह