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Hymn No. 360 | Date: 16-Sep-1998
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प्रभु नाम रस पीना तू सीख जा, जीना सीख जायेगा मुस्कूरा के हर पल को।
प्रभु नाम रस पीना तू सीख जा, जीना सीख जायेगा मुस्कूरा के हर पल को।
दल – दल में जो तू फंसा है अब तक, सहारा मिल जायेगा प्रभु नाम का तूझें ।
मत कर इंतजार नाम रस पीनें का, हर पल शुभ है शुभारंभ के लिये।
न्यौता ना दीया उसनें कीसी को, ना ही कोई पराया उसका अपना है ।
हर इक् को उसनें दीया है मौका, उस मौकें का फायदा उठाना हमारें अपने उपर है ।
तेरी पहुंच है दुनिया वालो तक, उस तक पहुंचने के लिये पीना पड़ेगा प्रभु नाम रस।
कीमत तू मत पुछ इसकी जिन्हांने पीया अमृत, वो भी तरसें प्रभु नाम रस पीनें को ।
जीसनें पीया इसे, प्रभु के दिल में अजर – अमर हो जाता है ।
हर कार्य का शुरूआत कर प्रभु का गुणगणन करकें, मध्य और अंत में तू यशोगान कर
नशा जब छायेंगा तूझपे, फूट – फूटकें रोयेंगा, बद से बदतर होगी तेरीं हालत ।
दुनिया भरकी जहालत सहकें, तू प्रभू नाम रस पीयेंगा।
दोष ना होगा इसमें तेरा, दीवाना बना फिरा वो जिसनें चखा इसे एक बार ।
हर स्वाद का सुख क्षण मात्र के लिये है, में स्वाद जो जिव्हा पे चडा हर स्वाद फीका नजर आयेंगा।
डिगा नहीं सकता तूझे कोई इससे, जब तू ही नहीं है ता कोई कैसे हरा सकता है तूझे।
- डॉ.संतोष सिंह
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घी का दीप दीखाऊँ मैं तेरे सामनें, प्रेम की ज्योत् जला दें तू मेरे मन में।
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शौक रहे हमें बस तेरा, तुझसे शुरू होके तूझ तक सीमित रहे हमारी दुनिया ।
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