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Hymn No. 368 | Date: 19-Sep-1998
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लगन मेंरी तेरे प्रति बडती जाये परवा ना करूं दिन भ के खट्पट् की।
लगन मेंरी तेरे प्रति बडती जाये परवा ना करूं दिन भ के खट्पट् की।
आहिस्ता – आहिस्ता दिल को लत लग जाये तेरी, कहीं भी रहूँ दिल डूबा रहे तुझमें ।
मेरा मन कीतना भी रहे बैचेन, पर दिल में होगा सकून, तो वो भी हो जाये शांत,
मन्नत मैं तुझसे नहीं मांगता, पर दिल में मेरे तेरा प्रवेश हूँ चाहता ।
गप्पें बहुत हाकां, अब शांत मन से दिल में निहारना चाहता हूँ तूझे ।
जतन तो मैं कुछ ना कर पाया हूँ, अब तेरी बातें और तुझको जतन करना चाहूँ दिल में ।
तेरी कृपा होगी तो हर पल को अहसास होगा तेरा, दूर नहीं दिल के कहीं आस – पास होगा
दिल ही दिल में बैचेन होता जा रहाँ है दिल मेरा तेरे लिये ।
जिंदा दिल होके जीना चाहता हूँ, हर आशाओं – निराशाओं से दूर रहके दिल में तूझे संजोना चाहता हूँ ।
खलबली मचती रहेगी ऐसे ही जब तक दिल – दिल में हिलमिल ना जायेगा ।
- डॉ.संतोष सिंह
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बना दें हमकों अपने चरणों की धूल, सूधर जायेगी हमारी हर भूल ।
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मल – मलकें तन को धोया बहुत बार, पर मनकें मैल को धो न पाया एक बार ।
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