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Hymn No. 369 | Date: 19-Sep-1998
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मल – मलकें तन को धोया बहुत बार, पर मनकें मैल को धो न पाया एक बार ।
मल – मलकें तन को धोया बहुत बार, पर मनकें मैल को धो न पाया एक बार ।
एक से एक सुगंधि द्रव्य लगाया, तन के दुर्गंध को दूर करनें वास्तें ।
मन के अंदर पैदा होने वाले कूविचारों को रोक ना पाया कभी ।
प्रभु उभार दें तू मुझे उन सबसे, निश्चित, निर्मल मन से पुजा करूं तेरी ।
मेरे दिल में प्रेम भर दें इतना, भूल जाऊँ खुदको तुझमें ।
अनवरत बहता चला जाऊँ प्रेम की धारा में मैं तूझ तक ।
- डॉ.संतोष सिंह
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लगन मेंरी तेरे प्रति बडती जाये परवा ना करूं दिन भ के खट्पट् की।
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ऱालत मेरी हो गयी है पागलों सी, पागल और मुझमें भेद करना बडा मुश्किल है ।
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