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Hymn No. 371 | Date: 21-Sep-1998
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अधिकार मेरा मुझपे ही नहीं तो कीसी पे कैसे कर सकता हूँ,
अधिकार मेरा मुझपे ही नहीं तो कीसी पे कैसे कर सकता हूँ,
जुर्रत करता हूँ ये कहते हुये मेरा अधिकार बस तूझपे है ।
ढालनां चाहता हूँ सबको अपने मुताबिक, खुद को ढाल नहीं पाता तेरे मुताबिक,
हर हॉल में तेरा सान्निध्य पाना चाहते है, पर वैसा काम ना है करते हम।
होश में रहतें हुये ओढे रहते है बेहोशी की चादर।
आंखे तूने हमारी कई - कई बार खोला, पता नहीं क्यों है मूंद जाती ।
दूसरों के दर्द की परवाह ना है करतें, अपने दर्द पे आँसू जार – जार है बहातें ।
फfिsंााद का तांता बांध देते है विश्वास को भुलाकें ।
इतना कमजोर क्यों हो जाते हें, गमों के सैलाब से घिरते ही।
हर बार भाग कें शरण लेतें हें sरे पास, तूझ तक आते – आते मुसरूफ हो जात है खूद में ।
कब सच्ची इबादत करेंगे हम तेरी ऐं खुदा तू यें बता दें ।
हमारें पैरों पे पड़ाr बेड़ीयों को तू तोड़ दें, निजात चाहता हूँ अपनी आदिम इच्छाओं से ।
सौगात तूझे देनें के लिये कुछ ना है मेरे पास खुद के सिवाय ।
बस तेरा नाम हो, तेरे गीत गुंजे चारों और बेसुध होके थिरकूं मैं तेरे चारों ओर ।


- डॉ.संतोष सिंह