VIEW HYMN

Hymn No. 376 | Date: 23-Sep-1998
Text Size
हमारें हर पलें का हिसाब तू है रखता, जब हम तुझसे कुछ पूछते है,
हमारें हर पलें का हिसाब तू है रखता, जब हम तुझसे कुछ पूछते है,
तू कहता है मुझे कुछ नहीं पता, खेल तू कैसा ये है खेलता है।
हम अकेलें ही अपना खेल – खेल नहीं पातें, तू कैसे हर इक् के संग है खेलता;
खेल में नियम तू ने ना कोई है रखा, गत दूसरों की देखकें कपंकपा जाती है हमारी रूहें।
खेल ही खेल में राजा और रंक बनते है, चलता ही रहता है बनना और बिगडना।
रूका ना कभी यें खेल, जारी सदीयों से इससे ना कोई है बच सका।
हर इक् की पारी आती है, आनें पे खेलना पड़ता है सबको।
हार, जीत हो के भी ना है बस खेलना है खेल कें लिये ।
रेफरी बस एक है वो, वहीं रूप बदल – बदलकें है खेलता।
मजा भी खुद है लेता, सजा भी है खुद को देता।
जाने – अंजाने हर कोई है खेलता, पाला है बस बदलता रहता ।
जो साथ उसका पा जात है वे मुक् दर्शक है बन जातें ।


- डॉ.संतोष सिंह