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Hymn No. 376 | Date: 24-Sep-1998
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जुडते जान, जुडते जान है, मन पे काबु करतें हुये तुझसे जुडते जाना है ।
जुडते जान, जुडते जान है, मन पे काबु करतें हुये तुझसे जुडते जाना है ।
दिल के सहारे तन – मन को लेकें तेरी और बढते जान है ।
समझेगा कोई कुछ भी, अधिकार है समझनें का उसका।
हमें तो बस उससे जुडते जान है जुडते जाना है ।
उसको लेकें लडना ना है कीसी से, लडना तो है अपने आप से ।
जब चल पड़ है उससे मिलनें तो बेधडक होके चलना है ।
अच्छी – बुरी बात होती रहती है हर चक्र को तोड़ते हुये बडते रहना है।
पश्चाताप् के स्टेशन पर रूकना कूछ पलों कें लिये, सच्चे दिल को बल है मिलता।
हर उतार - चढाव में रमतें हुये निज् आनंद में है रहना ।
धीरे – धीरे हर डर को मन से निकालके उससे जुडते जाना, जुडते जाना है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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निवेदन करता हूँ मैं तुझसे ओ मेरे रहनुंमा, हिलोर के रख दें तू मुझे, अंदर ही अंदर झकझोर दें।
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