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Hymn No. 378 | Date: 25-Sep-1998
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जारी रहेगा कब तक तेरा खेल खेलनें का हमशें ।
जारी रहेगा कब तक तेरा खेल खेलनें का हमशें ।

तू कहता है तो मान लेतें है, हम खुद ही खेल खेलतें है खुदशें ।

खेल – खेल में हम कभी जीतते है हारते रहते है तुझसे ।

समझ नहीं आता क्यों यें खेल चलता रहता है ।

क्या सीखाना चाहता है तू हमें, क्यों भूल जाते है हम अपने में तूझे ।

न जाने कीसके – कीसके वश में है रहते है हम इच्छा, मोह, लोभ ।

इक् मैं अकेला उसपे भी जोर है चलला जाने, अंजाने कर्मों का ।

कूछ को टालते है, कुछ को पड़ता है सहना, रहना पड़ता है इन सबके संग ।

पता नहीं यें खेल है कैसा, जितना समझनें की कोशीश करता हूँ इतना ही उलझा जाता है ।

थकना नहीं चाहता ना ही हिम्मत हारना, तेर नाम लेतें हूयें – गुजारना चाहता हूँ जीवन के हर पल को।


- डॉ.संतोष सिंह