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Hymn No. 382 | Date: 25-Sep-1998
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परमज्ञानी, परमस्नेही सद्गुरू काकाश्री महाराज, अधुरे है हम जब तक दूर है तुझसे ।
परमज्ञानी, परमस्नेही सद्गुरू काकाश्री महाराज, अधुरे है हम जब तक दूर है तुझसे ।
परिपूर्ण तू एक, ब्रम्हां विराजें तुझमें, हर पल करता सृजन एक नया जग, और एक जग का करता संहार । देखकें कोई पहचान ना है सकता, तेरी कृपा से सब कोई है जानतें ।
प्यार भरी नजर तेंरी, भीतर तक भीगे जाती हमें । हर पल रहता है तू संग हमारें, अंजान है हम तुझसे । गीत सुनाकें याद दिलाता तेरी, अतृप्त मन को शांती है मिलती।
खोया ही खोया था इस जग में, पाकें सब कूछ । परम् तेरा साथ जो मिला हमें, क्यां नहीं कर सकता क्या हाथ आ गया हमारें ।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्रदीप्त हुआ है जो, हमारें दिलों में प्रेम का दीप । कृपा करना प्रभु तू अनवरत उसे जलतें रहनें देना ।
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नदीं बहती जाती है सागर की ओर, हम भी बहतें जा रहे परम् पिता की ओर।
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