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Hymn No. 383 | Date: 26-Sep-1998
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नदीं बहती जाती है सागर की ओर, हम भी बहतें जा रहे परम् पिता की ओर।
नदीं बहती जाती है सागर की ओर, हम भी बहतें जा रहे परम् पिता की ओर।
राह में रूकावटें आती है हजार, कभी रूक कें, कभी मुडकें बहती ही रहती है।
निश्चिंत रहती है जहाँ – जहाँ, से जाये लोक कल्याण करते हुये जाती है बहती।
अच्छें – बुरें जो भी आता है सबकी प्यास बुझाती हुये बहती जाती है ।
विश्वास से लबालब भरी होती है, बहना जारी रहता हं विश्वास के सहारें ।
कहीं रूंकना भी है पड़ता, कहीं गिरना भी है पड़ता, पर बहना सदैव जारी रखती है।
समर्पण की भावना अटूट रहती हें, मचलते, उछलतें, कूदतें हुये सागर की ओर बहती है।
त्याग करती रहती है हर पल अपना ओरों के लिये।
बिन् कहें सीखा जाती है बहूत कुछ प्रेम, श्रध्दा, विश्वास, समर्पण का संदेश देती है।
हर कर्म करतें हुये प्रभु तुझसे जुड़े रहे हम, तेरा स्मरण सदा बना रहे हमें।
- डॉ.संतोष सिंह
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परमज्ञानी, परमस्नेही सद्गुरू काकाश्री महाराज, अधुरे है हम जब तक दूर है तुझसे ।
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मेरा प्रेमी तू है, तेरी याद आतें ही दिल की धडकन है बड जाती।
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