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Hymn No. 386 | Date: 28-Sep-1998
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प्रभु पतंग की तरह हें हम, मन की डोर के सहारें झूमते है
प्रभु पतंग की तरह हें हम, मन की डोर के सहारें झूमते है
इच्छाओं के झोको के संग झूमते फिरते है हम इधर – उदार
कर्म हमारी फिरकी है, जितना अंबार होता है कर्मों का उतनें दूर तक उडते है हम
उडानें वाला बस तू है जब चाहें आसमान में फिरोंये या धूल चढायें ।
तू ही इक् करता है नियती से बंधे है हम,
करतें वक्त सोचा ना था हमनें, तो भाग्य का रोना क्यों रोना ।
करनीं हम अपनी हें भुगततें, समेंटना है तेरे हाथों में अब,
जब दूर हो जाते है तुझसे, होश आता है हमें तेरा ।
उतर के तेरे चरणों में आना चाहते है बेबश हो जाते है आदत के चलते;
प्रभू तू है दालू मौका नहीं मांगते तुझसे, बस तेरे चरणों में चाहते लौटना ।


- डॉ.संतोष सिंह