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Hymn No. 389 | Date: 29-Sep-1998
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रोकों ना मुझे जाने दो, जहाँ से मैं आया हूँ।
रोकों ना मुझे जाने दो, जहाँ से मैं आया हूँ।
तूफानों से घिरा में, भटक गया हूँ यहाँ – वहाँ,
आश की कीरन नजर आ रहीं है, भलें वो है दूर,
मुझे पता है वहाँ मेरा इंतजार कर रहा है कोई,
वहीं तो है सपनों मं आकें सीखाता है जीना,
लोभ, मोह, इच्छा के बिना पूरी कर सकते है ये यात्रा,
सताते तो है हम खूद को, वो हर बार मुक्त कराने आता,
दूर क्यों हम है खोजते, वो तो रहता है दिलों में हमारे,
जो अंदर है वहीं बाहर से हो जाना है, निशंक बनकें
या जो होता है होनें देना है, रोना नहीं है रोना,
खिलौना ना है बनना अपने अरमानों का,
मौत और जीवन से परें है हम, कीस बात का है डर ।


- डॉ.संतोष सिंह