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Hymn No. 393 | Date: 30-Oct-1998
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इतनें सारें लोगों के बीच में रहके हूँ अकेला, दूर कर दें अकेलापन मेरा।
इतनें सारें लोगों के बीच में रहके हूँ अकेला, दूर कर दें अकेलापन मेरा।
साथ – साथ लें चल मूझे अनंत महायात्रा यें, दास बनकें करूंगा सेवा मैं तेरी।
हर वो धर्म निभाऊंगा, जो इक् स्त्री अपने पति के सेवा के लिये है करती।
तेरी मर्जी के आगे सदा सर झुकाउँढगा, अपने असमर्थता को त्याग कें हर फायदा।
दिल ही दिल में तूझे निहारा करूंगा, खुलीं आँखें बस तेरे चरणों को देख कदमों कर दिया।
तेरे अधीन होने के लिये मैं, अपने उन्मुक्त इच्छाओं को त्याग दूंगा।
पास तू रह न पायं मेरे, पर वास करना मेरे दिल में जरूर, इसका अहसास मुझे रहे।
मेरा वनवास तब ही खतम् होगा प्रभु, जब मेरे मन कें रावण को तू जलायेंगा।
हर वो पल बदल जायेगा, तू जब हमें मीठें गीत सुनायेंगा।
मन मेरा तुझसे जुड जायेगा, तू चाहेंगा वो हम कर दीखायेंगा।


- डॉ.संतोष सिंह